"धारावाहिक उपन्यास"
-रामबाबू नीरव
जब से पूर्णिमा जी स्वर्ग सिधारी थी, तब से ही किशन राज जी ने बसुंधरा पैलेस में कदम रखना ही छोड़ दिया था. उनका एक बंगला संसद भवन इलाके में भी था. अपने उस बंगले के नीचे वाले भाग को उन्होंने ऑफिस बना दिया और ऊपर स्वयं रहने लगे, बिल्कुल एकाकी. ऐसा लगने लगा जैसे उन्हें अपने परिवार से मोह भंग हो गया हो. इस समय वे अपने ऑफिस के मीटिंग हॉल में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ किसी गूढ़ समस्या पर विचार विमर्श कर रहे थे. अचानक दरवाजा पुश करके इक संभ्रांत सी दिखने वाली युवती अंदर दाखिल हुई. उस युवती पर नजर पड़ते ही किशन राज जी को ऐसा लगा जैसे सैकड़ों बिच्छुओं ने उन्हें डंक मार दिया हो. वे अपनी जगह पर उछल पड़े. वहां उपस्थित सारे के सारे नेता भी आश्चर्य से उस युवती को घूरने लगे.
"कौन हो तुम?" हालांकि किशन राज जी ने कड़कती आवाज में पूछा था, फिर भी उनकी आवाज कांप रही थी.
"क्या मुझे देखकर आपको अंदाजा नहीं हुआ कि मैं कौन हो सकती हूं?" युवती ने निर्भीक स्वर में उत्तर दिया. उसकी निर्भीकता देखकर सभी चकित रह गये. वहां उपस्थित नेतागण मन ही मन सोचने लगे -"इतनी बोल्ड कोई साधारण लड़की नहीं हो सकती. निश्चित रूप से इस लड़की का किशन राज जी के साथ कोई न कोई संबंध है." वैसे तो किशन राज जी का होश गुम हो चुका था फिर भी वे हलक फाड़ कर चीख पड़े.
"ह्वाट नॉनसेंस, तुम्हें अंदर किसने आने दिया.?" उनकी चीख सुनकर क्षण भर के लिए युवती का चेहरा जर्द़ पड़ गया, परंतु शीध्र ही वह संभल गयी और पूर्व की भांति निर्भीक स्वर में बोली-
"मेरे भैय्या मि० अभय राज ने."
"क्या......!" अभय राज का नाम सुनते ही किशन राज जी को ऐसा लगने लगा जैसे उनके दिल की धड़कन बंद हो जाएगी. उनका चेहरा फक् पड़ गया.
"जी.... हां, अपनी बहन अमृता राज को मैं ही यहां लेकर आया हूं." द्वार खोलकर भीतर आ रहे अभय राज की विषैली आवाज उनके कानों में पड़ी. वे फटी फटी ऑंखों से उन दोनों को देखने लगे. उनका सर चकराने लगा. राजनेताओं के भी आश्चर्य का ठिकाना न था. अभय और अमृता की शक्लें बिल्कुल एक जैसी थी. उन नेताओं को ऐसा लगा जैसे वे लोग कोई बम्बइया फिल्म देख रहे हों. रहस्य और रोमांच से भरा हुआ फिल्म. मगर इस फिल्म की कहानी उनलोगों की समझ से बाहर थी.
"अभय..... तुम!" काफी देर के बाद किशन राज जी के मुंह से अस्फुट सा स्वर निकला.
"शुक्र है एमपी किशन राज जी कि आपने मुझे पहचान तो लिया.!" अभय की आवाज इतनी तीखी थी कि किशन राज जी आहत होकर तड़पने लगे. -"आपको इतना आश्चर्य क्यों हो रहा है एमपी साहब...यह लड़की झूठ नहीं बोल रही है, यह मिसेज माया राज की ही बेटी है."
"क्या बकवास कर रहे हो तुम, कौन है यह माया.?" किशन राज ने सच को दबाने की बहुत कोशिश की, परंतु दबा नहीं पाये. उनके ललाट पर पसीने की बूंदें उभर आई.
"वही माया जिन्हें आपने खुश होकर हुस्नबानो के खिताब से नवाजा था."
"ओफ्....!" तिलमिला उठे किशन राज जी. -"अभय....अभय तुम इस लड़की को लेकर जाओ यहां से. यहां हमारी पार्टी के वरिष्ठ नेतागण मौजूद हैं."
"अच्छा है, कम-से-कम इन राजनेताओं के समक्ष आपका असली रूप तो सामने आना ही चाहिए."
"तुम यहां से जाओगे या.....!" गला फाड़कर चीख पड़े किशन राज. "यदि नहीं गया तो क्या आप धक्के देकर निकलवाएंगे." अभय का स्वर इतना तीखा और कसैला हो गया कि सभी दंग रह गये. एक बेटा अपने उस बाप के प्रति इतना उग्र हो सकता है, जो कि वर्तमान में एमपी है. यह बात वहां उपस्थित नेताओं के लिए कल्पना से पड़े थी. इतना तो वे लोग समझ ही गये कि ये दोनों किशन राज जी की ही संतानें हैं. अब किशन राज विचलित नजर आने लगे और कातर दृष्टि से अभय तथा अमृता को देखते हुए मौन अभ्यर्थना करने लगे.
"वैसे आप जैसे पत्थर दिल इंसान से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है. " अभय एक एक शब्द पर जोर डालते हुए अपने मन की भड़ास निकालने लगा -"आप जन प्रतिनिधि हैं, किसी भी जन प्रतिनिधि का प्रथम कर्तव्य होता है जनता की समस्याओं को सुलझाना. मगर आप ऐसे जन प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने अपने ही परिवार को समस्याओं के मकड़जाल में उलझाकर रख दिया. आपने अमृता से पूछा है कि यह कौन है, आप अपने ही दिल पर हाथ रखकर कहिए कि यह है कौन?"
"उफ़.... अभय, बस करो." किशन राज जी का कलेजा फटने लगा. उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन उनका अपना ही पुत्र उन्हें बेनकाब करके रख देगा. वे बेचैनी से टेबल पर मुक्का मारने लगे.
"बहुत तकलीफ़ हो रही है न आपको, मगर जरा सोचिए, उस औरत को कितनी तकलीफ़ हुई होगी, जिसे आपने अपनी ब्याहता पत्नी का दर्जा देकर बाज़ारू बनाने की कोशिश की. यदि वह औरत बदचलन रही होती, तो आपकी पूरी दौलत की मालकिन बन गयी होती. परन्तु हालात और क्रूरता की शिकार हुई उस महान औरत ने राज खानदान पर दाग तक नहीं लगने दिया. बीस वर्षों तक गुमनाम रहकर नौटंकी के स्टेज पर नाच-गान करती रही और राज खानदान की इस धरोहर को इस लायक बना दिया कि यह सीना तानकर कर लोगों से यह कह सके कि मैं बसुंधरा फूड प्रोडक्ट्स प्रा० लि० के मैनेजिंग डायरेक्टर सेठ धनराज जी की पौत्री और एमपी किशन राज जी की पुत्री हूं. सोचिए जरा -"एक वो औरत है, जो लोगों का मनोरंजन करती हुई अपनी बेटी को एमबीबीएस करवा रही है और एक आप हैं, वो महान हस्ती जिन्होंने साधन सम्पन्न होने के बावजूद भी अपने बेटे को शराबी और मवाली बनने को मजबूर कर दिया. क्या मिला आपको इस घृणित महत्वकांक्षा से....?" कुछ देर के लिए अभय रूक गया. उसकी जज़्बाती बातें सुनकर सारे लोगों की ऑंखें नम हो गई. उस वातानुकूलित हॉल के सन्नाटे को भंग करती हुई सिर्फ अमृता की सिसकियां सुनाई दे रही थी. शर्म से किशन राज जी की नज़रें जो झुकी तो फिर दुबारा न उठी. फिर अभय राज की आवाज उभरी. इस बार उसकी आवाज में जो दर्द और आरजु छुपी हुई थी, उसे महसूस कर किशन राज जी का कलेजा छ्लनी हो गया.-"पिताजी आपने आज तक अपने एकलौते बेटे को कुछ भी नहीं दिया. बाप का प्यार कैसा होता है, यह भी मैं नहीं जान पाया. आज आपका बेटा आपसे भीख मांग रहा है, मेरी बहन को इसके बाप का नाम दे दीजिए. इसे आपकी धन-संपत्ति में से फूटी कौड़ी भी नहीं चाहिए. इसकी मां ने इसे इस लायक बना दिया है कि यह अपनी मंजिल खुद तलाश कर लेगी. बस एकबार इसे कह दीजिए कि आप ही इसके जन्मदाता है, ताकि इसकी मां के माथे पर जो कलंक लगा हुआ है, उस कलंक से यह मुक्ति पा जाए." अभय अमृता के पास ही बैठकर फूट फूटकर रोने लगा. उन दोनों के क्रंदन से पत्थर दिल माने जाने वाले राजनेताओं का भी कलेजा फटने लगा. सभी की ऑंखें किशन राज जी पर जाकर स्थिर हो गयी. किशन राज की हालत ऐसी हो चुकी थी, जैसे उनके शरीर में जान ही न हो. अचानक उनकी ऑंखों से बेशुमार ऑंसू बहने लगे और उनके सीने में तूफान मचलने लगा. -"माया मां बनने वाली थी और मुझे कुछ पता ही न चला, उसने मुझे बताया क्यों नहीं.? खुद को ऊंचा, बहुत ऊंचा उठाने की घृणित काम महत्वकांक्षा ने मुझे इतना बड़ा पापी बना दिया. मेरी इसी महत्वकांक्षा के कारण ही पूर्णिमा मुझसे दूर बहुत दूर चली गयी. और भोली-भाली माया को मैंने हुस्नबानो बना दिया. ओफ् मेरे इन गुनाहों को शायद भगवान भी माफ नहीं कर पाएंगे." वे अपनी जगह से उठकर खड़े हो गये और धीरे-धीरे पग बढ़ाते हुए उन दोनों के पास पहुंचे. उनके मुंह से भर्राई हुई आवाज निकली -"उठो मेरे बच्चों." अभय और अमृता चौंक पड़े और वे दोनों अपनी अपनी नजरें उठाकर उनकी ओर देखने लगे. किशन राज जी की ऑंखों से पश्चाताप के ऑंसू बह रहे थे.
-"मैं इस लायक तो नहीं हूं कि तुम दोनों से माफी मांग सकूं. फिर भी मांग रहा हूं, हो सके तो मेरे गुनाहों को माफ कर दो.
"पिताजी." अभय और अमृता बेतहाशा उनसे लिपट गये. पूरा वातानुकूलित हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. किशन राज जी के सारे राजनीतिक मित्र प्रसन्नता से झूम उठे. और उनकी ऑंखों से भी प्रसन्नता के ऑंसू बहने लगे. किशन राज जी को अब एहसास हुआ कि अपने प्रियजनों के प्रेम के समक्ष संसार का समस्त ऐश्वर्य और वैभव तुच्छ है. यह एहसास ही उनकी आत्मशुद्धि थी.
"पिताजी, मां आपकी प्रतीक्षा कर रही है." उनसे विलग होते हुए अभय ने कहा.
"क्या, माया.....?"
"हां पिताजी."
"कहां है माया?"
"वसुंधरा पैलेस में."
"ओह.... यह चमत्कार तुम्हारे दादा जी द्वारा ही किया गया है न ?"
"हां....!"
तो देर क्यों कर रहे हो, चलो जल्दी." वे अभय और अमृता की कलाई थाम कर ऐसे भाग खड़े हुए, जैसे उनके पर निकल आएं हों. उनकी इस बेताबी को देखकर उनके मित्रों के ठहाके से पूरा कक्ष गूंजने लगा.
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क्रमशः........!
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