फिल्मउद्द्योग में उनका पदार्पण 1957 से फिल्म पहनावा अथवा फैशन से माना जाता है। हरियाली और रास्ता 1961 के बाद वो कौन थी 64, दो बदन, सावन की घटा, पत्थर के सनम और अनीता 66 , के बाद एक बार जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को बताया के वो अभिनेता है तो शास्त्री जी ने उन्हें कहा के एक फिल्म जय जवान- जय किसान पर बनाओ तब उन्होंने अपना बैनर बनाकर फिल्म "उपकार" बना डाली। फिल्म ज़बरदस्त हिट हुई और मनोज कुमार ब्रांड भी हिट रहा लेकिन आगे चलके वह इतना हिट नहीं रह पाया। पूरब और पश्चिम, यादगार, पहचान, शोर रोटी कपडा और मकान, सन्यासी आदि से होते हुए 1972 में सोहनलाल कँवर के निर्देशन में आई फिल्म " बेईमान" से एक बड़ा विवाद उबार कर सामने आया जब फिल्म प्राण ने फिल्फेयर अवार्ड अस्वीकार करते हुए फिल्म फेयर पुरुस्कारों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता मनोज, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सोहनलाल कँवर, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता प्राण आदि को पुरुस्कार घोषित किये गए थे जबकि उस वर्ष अन्य फिल्मे थी पाकीज़ा ( मीना कुमारी ) दुश्मन ( राजेश खन्ना ) अपना देश ( राजेश खन्ना - मुमताज़ ) अमर प्रेम ( शर्मीला, राजेश खन्ना ) गोरा और काला ( राजेंद्र कुमार - हेमा ) विक्टोरिया नंबर 203, जोरू का गुलाम, समाधि, जोरू का गुलाम , अपराध और रामपुर का लक्ष्मण भी रिलीज़ हुई थी। फिल्म क्रांति को उनकी लार्जर थान लाइफ माना जा सकता है जिसे 10 में से 7. 5 की रेटिंग मिली थी। इसके सितारे दिलीप कुमार, मनोज कुमार, शशि सकपूर, शत्रुधन सिन्हा, हेमा, परवीन बॉबी , प्रदीप कुमार आदि थे और कहानी थी सलीम- जावेद की।
कभी फ़िल्मी पार्टियों में नहीं देखे गए, शराब, सिगरेट आदि से दूर रहते थे,हवाई यात्रा से बचते थे। विवादों से दूर रहते थे। मनोज अक्सर हेरोइन का चयन उस काल के अनुसार सबसे सेलेबल देखकर करते थे।
मुझे याद पड़ता है के डिम्पल ने एक बार राजेश खन्ना से शिकायत की थी के फिल्म के लिए साइन करना है तो दिन में फ़ोन करे, ये रात में क्यों फ़ोन करता है ? राजेश खन्ना काफी शांत स्वभाव के थे। मुझे वो दिन भी याद आता है जब टीना राजेश के साथ लिव इन रिलेशन में थी और संजय दत्त टीना पर मरते थे तब एक दिन जब राजेश खन्ना शूटिंग कर रहे थे तो संजय दत्त तेज़ी से चलते हुए आये और कुर्सी घसीट कर राजेश खन्ना के सामने बैठ गए और उनकी आँखों में ऑंखें ड़ाल दी। खैर कोई हादसा नहीं हुआ क्योंकि उस समय तक संजू बाबा बड़े अग्रेसिव स्वभाव के हुआ करते थे।
शर्मीला टैगोर के साथ उन्होंने एक फिल्म सावन की घटा की थी जो गुलशन नंदा के उपन्यास पर आधारित थी। फिल्म औसत रही थी, गाने हिट थे। शर्मीला ने बताया था के फिल्म शोर और रोटी कपडा और मकान दोनों ही फिल्मो में मनोज उन्हें लेना चाहते थे लेकिन शोर में उन्हें नंदा वाला रोल पसंद था और रोटी कपडा और मकान में उन्हें मौसमी वाला रोल ऑफर किया गया था जो उन्हें पसंद नहीं था। उस समय शर्मीला एक बड़ा ब्रांड थी जो राजेश खन्ना, अमिताभ और संजीव कुमार जैसे हीरोज के साथ सुपर हिट दे रही थी। शुरू शुरू में जब उनके पुत्र सैफ अली खान का पदार्पण हुआ तो रवि प्रकाश छंगाणी जी का मानना था के
अगर साडी पहना दी जाये तो वे हेरोइन की भूमिका भी सफलता पूर्वक कर सकते है।
- सैयद इज़हार आरिफ़
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